Poet, Author, Blogger
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कौन जीता इस जहां में कौन हारा है हे प्रभु..... बस तेरा ही इक सहारा है निज शरण मम वरण कर लीजे जी जिस तरह आपने सबको तारा है
मेरे लिए ज़िंदगी हमेशा से एक अनसुलझी पहेली रही है, अभी तक भी नही समझ पाया। सभी पाठकों के लिए ज़िंदगी का पन्ना अलग- अलग है। सभी के लिए जीवन भिन्न-भिन्न कलेवर के साथ आता है। प्रस्तुत है आपके लिए एक कविता : आपका अटल नारायण
जगत जननी अम्बे,मेरी सुध भी तूं ले ले
हे राधे,गायत्री चरण निज शरण तूं दे दे
नमस्ते दुर्गे सरस्वती च नमस्ते
नमस्ते काली गायत्री च नमस्ते
नमस्ते उमा जग कल्याणकारी
माँ दुर्गा नमस्ते, नमस्ते नमस्ते
जगत का पालन भी अंब तुम ही करती हो
हमारी की रक्षा में चण्डी का रूप धरती हो
शताक्षी हे गौरी माँ राधे उमा तुम्ही हो
लक्ष्मी सीता भी, परमेश्वरी जगत की
नमः योगिनी योगमाया नमामि
नमः ब्राम्हिनी विश्वतेजा नमामि
नमामि काली, कलकंठी कराली
परमेश्वरी सिद्धिदात्री नमामि
हम अज्ञानी माता तेरी महिमा बखानूँ कैसे
बता दो तुम ही माँ, तुमको मैं पुकारूँ कैसे
ब्रम्हा की बुद्धि भी, जिसे नही जान पाई
वही वाली मैया, भगत को गोंद खिलाई
मैं शिव हूँ ….सत्य सनातन आदिपुरुष अविनाशी हूँ महाकाल विकराल उमापति घट घट का मैं वासी हूँ कैलाशी औघणदानी शिव आशुतोष संहारक हूँ त्यागी योगी नीलकंठ मैं ही सृष्टि के तारक हूँ ~अटल नारायण
स्वीकार है, स्वीकार है हमें धर्मपथ स्वीकार है माँ भारती की अर्चना में हम सदा तैयार हैं चाहे सुमनमय यह डगर हो या कंटको से हो भरी हमने भी माता भारती की ज्ञानमय वीणा सुनी उस परम ज्योति किरण से ज्योतिर्मय उदगार है स्वीकार है स्वीकार है
क्या करें,
इंसान खुद से हार जाता है
वैराग्य की उत्कण्ठा को
हर रोज जगाता है।
क्या करें,
इंसान खुद से हार जाता है
मन की चंचलता भी कुछ कम नहीं,
मान अपमान का इसे कोई गम नहीं,
इसिलिये कभी सराहा,
कभी दुतकारा जाता है।
क्या करें
इंसान खुद से हार जाता है।
मन भी क्या करे
उसकी चाबुक दिल के पास जो है।
दिल भी क्या करे,
उसे कुछ विशेष पाने की आस जो है।
उसी से कोई तड़प रहा है,
कोई उसे मार जाता है।
क्या करें
इंसान खुद से हार जाता है।
वैराग्य की उत्कण्ठा को हर रोज जगाता है।
क्या करें
इंसान खुद से हार जाता है।
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